अंदर
अंदर क्या चल रहा है #
तीन बातें जो अक्सर इन शब्दों के नीचे होती हैं।
जब करियर डिग्री से मेल न खाए, तो लगता है सौदा बीच में टूट गया।
कई घरों में ये पापा की इस बात से आया: “डिग्री वो चीज़ है जो कोई तुमसे छीन नहीं सकता।”
इस ख़याल के नीचे एक नियम बैठा है: “सही डिग्री से सही करियर बनता है,” या “नौकरी पढ़ाई से न मिले, तो कहीं कुछ गड़बड़ हुई।”
प्रतिक्रियाएँ
लोग अक्सर क्या करते हैं #
- पारिवारिक जमघट में काम की बात टाल देना
- हर बार कहना कि “ये तो बस अभी के लिए है”
- सीधे रास्ते पर लौटने के लिए एक और कोर्स शुरू करना
- उन बैचमेट्स से तुलना करना जिनका काम डिग्री से मेल खाता है
- डिग्री बेकार लगना, और फिर ऐसा सोचने पर ख़ुद को कोसना
डेक
6 कार्ड में पूरी कहानी #
छह छोटे कार्ड, उस पल से छोड़ देने तक।
कमरे से आठ महीने के आवेदन
चार साल की पढ़ाई, अच्छी डिग्री, घर की दीवार पर टँगी दीक्षांत की फ़ोटो। आठ महीने बाद जयपुर के मानसरोवर वाले कमरे से आप अब भी आवेदन भेज रहे हैं, और जवाब में या तो विनम्र ना आती है या कुछ नहीं। स्कूल का एक दोस्त, जिसने कॉलेज छोड़ा था, टीम लीड बन चुका है। आप देर रात लैपटॉप बंद करके छत ताकते हैं।
वो डिग्री जिसे दरवाज़े खोलने थे
इसके नीचे एक नियम बैठा है: “अच्छी डिग्री से अच्छा करियर बनना चाहिए।” ये न्यायसंगत सौदे जैसा लगता है। आपने अपना हिस्सा निभाया। पर देखिए ये करता क्या है: बरसों की पढ़ाई की क़ीमत उस जॉब मार्केट से बाँध देता है जो आपके हाथ में नहीं। वो साल अब काम के लगें या नहीं, ये भर्ती, मौक़े और संयोग पर टिक जाता है।
हमने इस वादे पर भरोसा क्यों किया
हम इसे इसलिए पकड़ते हैं कि हमें बताया गया था कि पढ़ाई ही आगे का रास्ता है, और हमने मान लिया। शायद घर वालों ने आपकी पढ़ाई के लिए बहुत कुछ किया, और आप वो लौटाना चाहते हैं। शायद हर नंबर के लिए आपने जी-जान लगाया। जो भी हो, डिग्री से उम्मीद रखना भोलापन नहीं। ये चाह है कि आपकी मेहनत कहीं पहुँचे, और इसे दोष नहीं, नरमी चाहिए।
हर इनकार डिग्री को छोटा करता है
हर इनकार डिग्री को थोड़ा छोटा कर देता है। आप अपने फ़ैसलों पर शक करने लगते हैं। उन दोस्तों से तुलना करते हैं जो दूसरे रास्तों पर हैं। घर पर काम के सवाल से बचते हैं, पारिवारिक जमघट से भी। धीरे-धीरे दीक्षांत वाला गर्व फीका पड़ता है, और पढ़ाई के वो साल ग़लती जैसे लगने लगते हैं, जबकि उन्होंने किसी जॉब डिस्क्रिप्शन से ज़्यादा सिखाया।
क्या ये पुराना वादा रखने लायक़ है?
ईमानदारी से पूछिए: क्या इस सौदे को पकड़े रहने से सही नौकरी जल्दी आई? या इंतज़ार बस भारी हुआ? करियर अक्सर घुमावदार सड़कों से चलते हैं, और बहुत से लोग धीमी शुरुआत के बाद अपना रास्ता पाते हैं। जो भी हो, मुश्किल जॉब मार्केट आपकी डिग्री या आपकी क़द्र का पैमाना नहीं। इस नियम को इतना कसकर पकड़ना आपको उतना नहीं देता जितना लेता है।
रास्ते को थोड़ा घूमने देना
छोड़ने का मतलब ये नहीं कि डिग्री बेमानी थी। मतलब ये कि उसकी क़द्र अब अगले ऑफ़र लेटर पर नहीं टिकी। आप जानते हैं कि क्या सीखा और कितनी मेहनत की। आप कोशिश जारी रख सकते हैं, घुमावदार रास्तों के लिए खुले रह सकते हैं, और अपना रास्ता बनने दे सकते हैं। यहीं कुछ चैन लौटता है: पढ़ाई के वो साल आपके अपने रहते हैं, आगे जो भी हो।
Being held back for who you are, or harassed or frightened by anyone, is not part of this hope; it is worth taking seriously.
पलट
पुराना नियम, और आज़माने के लिए एक नया #
पुराना नियमअच्छी डिग्री से अच्छा करियर बनना चाहिए।
आज़माने के लिए नया नियमजो सीखा वो मेरा है। मेरा रास्ता थोड़ा घूम सकता है।
तीन छोटे दिन
3 दिन आज़माइए #
- दिन 1
तीन चीज़ें सोचिए जो आपकी डिग्री ने सिखाईं
- दिन 2
एक शाम बिना जॉब सर्च के कुछ मज़े का कीजिए
- दिन 3
इस हफ़्ते का एक छोटा क़दम गिनिए, और उसकी ख़ुशी लीजिए
इस पर बात करनी है?
“आपकी पढ़ाई की कौन-सी सोच आप बिना सोचे आज भी इस्तेमाल करते हैं?”
मुफ़्त और निजी। शुरू करने के लिए साइन-अप नहीं। बातचीत इसी सवाल से खुलती है।
यह डेक जो कुछ जानता है
और गहराई में #
यह कैसा सुनाई देता है, कहाँ से आता है, इसकी क्या कीमत है, और इसे देखने के दूसरे तरीके। हर सवाल पर बातचीत खुलती है।
यह कैसे लगता है
क्या कहा गया
गर्व वाली डिग्री, और दूर पड़ा काम #
छह साल पहले दीक्षांत समारोह की फ़ोटो घर की दीवार पर टँगी थी, मिठाई बँटी थी। आज इंदौर के किसी ऑफ़िस में दिन भर स्प्रेडशीट खुली रहती है, और काम का पढ़ाई से कोई लेना-देना नहीं। रविवार के खाने पर चाचा दूसरी रोटी परोसते हुए पूछते हैं, “अभी तक वही नौकरी?” और मन में वही बात उठती है: “अच्छी डिग्री से अच्छा करियर बनना चाहिए।”
कोई साइंस पढ़कर सेल्स में हो सकता है, कोई क़ानून पढ़कर घर की दुकान पर, कोई एमबीए करके ऐसे काम में जो एमबीए जैसा लगता ही नहीं। डिग्री सच है। जो करियर उसके साथ आना था, वो अभी पूरा नहीं आया।
जब आप पढ़ रहे थे, तब उस पढ़ाई में आपको क्या अच्छा लगता था?इस पर बात कीजिए ›
और उसमें से थोड़ा-सा आज भी कहाँ दिख जाता है?इस पर बात कीजिए ›
पहले कुछ पल
सवाल सुनते ही हल्की-सी चुभन #
कुछ लोगों को “आजकल क्या कर रहे हो?” सुनते ही आँखों के पीछे हल्की गरमी महसूस होती है। कुछ के चेहरे पर थकी हुई मुस्कान आ जाती है, और रटा-रटाया जवाब मुँह तक तैयार रहता है।
शरीर एक साथ दो बातें उठा सकता है: डिग्री का गर्व, और जहाँ तक पहुँचे उसकी हल्की शर्मिंदगी। ये मिली-जुली हालत असहज होती है, ख़ासकर शादी-ब्याह या पारिवारिक जमघट में, जब सब सुन रहे हों।
जब कोई एक ही साँस में आपका काम और आपकी डिग्री पूछे, तो सबसे पहले शरीर में क्या होता है?इस पर बात कीजिए ›
यह क्यों लगता है
डिग्री को रास्ता बताकर बेचा गया #
ये उम्मीद उसी पर टिकी है जो बहुतों को बचपन से सुनाया गया: अच्छी डिग्री ले लो, आगे नौकरी अपने-आप मिलेगी। इसमें बरसों की मेहनत, घर की उम्मीदें और कोचिंग की फ़ीस लगी थी। चाहना कि ये कहीं पहुँचे, दरअसल चाहना है कि वो सारा लगाया हुआ बेकार न जाए।
जब करियर डिग्री से मेल न खाए, तो लगता है सौदा बीच में टूट गया। “क्या ये सब ठीक था?” वाला सवाल सरक आता है, जबकि पढ़ाई के वो साल अपने आप में मायने रखते थे।
जब आपने ये डिग्री चुनी थी, तब आपको क्या उम्मीद थी कि ये कहाँ ले जाएगी?इस पर बात कीजिए ›
और ख़ुद को कैसा बनते हुए देखते थे?इस पर बात कीजिए ›
अंदर की आवाज़
रविवार के खाने वाली आवाज़ #
“इतना पढ़ाया-लिखाया इसी दिन के लिए?” “सब ने तो अपनी डिग्री का इस्तेमाल किया।” “मैं पीछे रह गया/गई।” ये आवाज़ अक्सर किसी शिष्टाचार वाले सवाल पर जागती है, और थाली हटने के बाद भी बोलती रहती है।
कुछ लोग देखते हैं कि ये आवाज़ पूरे करियर को अठारह की उम्र में खींची एक सीधी लकीर से नापती है, जैसे उस लकीर से हर मोड़ हार हो।
जब ये आवाज़ बोलती है, तो सबसे ऊँची कौन-सी लाइन होती है, और वो बीते हुए किसकी आवाज़ जैसी लगती है?इस पर बात कीजिए ›
यह कहाँ से आता है
यह कहाँ से आ सकता है
डिग्री से नौकरी का वादा कहाँ से आया #
कई घरों में ये पापा की इस बात से आया: “डिग्री वो चीज़ है जो कोई तुमसे छीन नहीं सकता।” कुछ ने इसे रिश्तेदारों से सीखा, जिनकी अच्छी नौकरियाँ थीं और सबकी डिग्री एक ही तरह की थी, तो रास्ता सीधा दिखता था।
कई परिवारों में डिग्री को एक काम की सीधी सड़क मान लिया जाता है। असल कामकाजी ज़िंदगियाँ मुड़ती हैं: दिलचस्पियाँ बदलती हैं, नई तरह की नौकरियाँ बन जाती हैं, और लोग पगडंडियों से रास्ता निकालते हैं।
घर या स्कूल में सबसे पहले किसने आपके लिए डिग्री से नौकरी तक की लकीर खींची, और उसे आपके लिए क्या दिखता था?इस पर बात कीजिए ›
इसके नीचे की मान्यता
डिग्री और करियर वाला नियम #
इस ख़याल के नीचे एक नियम बैठा है: “सही डिग्री से सही करियर बनता है,” या “नौकरी पढ़ाई से न मिले, तो कहीं कुछ गड़बड़ हुई।” नियम साफ़-सुथरा है। ज़्यादातर कामकाजी ज़िंदगियाँ साफ़-सुथरी नहीं होतीं।
कुछ लोग इसे घर की उम्मीदों तक ले जाते हैं, कुछ उन क्लासमेट्स तक जो सीधे मेल खाती नौकरी में लग गए। स्रोत से ज़्यादा ज़रूरी ये है: डिग्री को ख़ारिज किए बिना भी इस नियम को देखा जा सकता है।
सीधे-रास्ते वाला ये नियम आपको अगला क़दम चुनने में कहाँ अब भी काम आता है, और कहाँ हर मोड़ को ग़लती बना देता है?इस पर बात कीजिए ›
इसकी क्या कीमत है
इसकी क्या कीमत है
सीधी लकीर से नापने की क़ीमत #
एक क़ीमत गर्व की है: डिग्री का गर्व, आज के काम का गर्व, रास्ते में सीखे हुनर का गर्व। सब कुछ उस रास्ते से तौला जाता है जो लिया ही नहीं गया।
दूसरी क़ीमत जिज्ञासा की है। कुछ लोग ये देखना छोड़ देते हैं कि मौजूदा काम उन्हें कहाँ तक ले जा सकता है, क्योंकि वो कभी “प्लान” में था ही नहीं। इससे कुछ अच्छे दरवाज़े भी बंद रह जाते हैं।
आपका आज का काम आपको क्या देता है जिसे आप शायद ही गिनते हैं, क्योंकि वो प्लान में नहीं था?इस पर बात कीजिए ›
अगर यह ऐसा ही रहे
पढ़ाई से दूर का काम, और क्यों का सवाल #
एक आम कामकाजी दिन सोचिए जब “अच्छी डिग्री से अच्छा करियर बनना चाहिए” ज़ोर से सुनाई दे। मेट्रो या बस का सफ़र, इनबॉक्स, स्क्रीन पर किसी बैचमेट की नई पोस्ट। ये बस एक ख़ाका है, देखने के लिए।
शायद ऐसा काम हो रहा है जिसका पढ़ाई से कोई वास्ता नहीं, और मन में क्यों का सवाल है, फिर लंच में किसी क्लासमेट की ख़बर स्क्रॉल हो रही है।
ये बस एक दिन है, भविष्यवाणी नहीं, और जब चाहें बंद किया जा सकता है।
उस दिन में और क्या है जिस पर कम ध्यान जाता है?इस पर बात कीजिए ›
इसका कौन-सा हिस्सा आपकी नज़र खींचता है?इस पर बात कीजिए ›
इसे देखने का दूसरा तरीका
इसे देखने का दूसरा तरीका
कई करियर सीधे नहीं, घूमकर चलते हैं #
बहुत से लोग उस क्षेत्र में काम करते हैं जो उनकी पढ़ाई से अलग है। करियर अक्सर घूमते हैं, लौटते हैं, पगडंडी पकड़ लेते हैं। डिग्री अक्सर ये तय करती है कि कोई कैसे सोचता है, इससे ज़्यादा कि वो किस मेज़ पर बैठा है।
इससे निराशा कम नहीं होती, और उम्मीद जायज़ बनी रहती है। बस इतना है कि घूमकर चलता करियर आम बात है, और इस बात का सबूत नहीं कि कुछ बिगड़ गया।
आपकी डिग्री की कौन-सी सोच आप आज भी इस्तेमाल करते हैं, भले ही काम बेमेल लगे?इस पर बात कीजिए ›
जो पहले से है
डिग्री आज भी क्या देती है #
शायद जितना दिखता है उससे ज़्यादा है: कॉलेज के दोस्त, ध्यान से पढ़ने की आदत, कुछ मुश्किल सीखने का भरोसा, कोई विषय जिसके बारे में रविवार को पढ़ना अब भी अच्छा लगता है।
इन्हें देखने से करियर वैसा नहीं बन जाता जैसा सोचा था। ये भी यहीं हैं, उन बरसों की शांत वापसी, जो रविवार के खाने के सवाल के नीचे आसानी से छूट जाती है।
किसी भी नौकरी से परे, आपकी डिग्री ने आपको अब तक क्या दिया है जिसे आप थोड़ा और देखना चाहेंगे?इस पर बात कीजिए ›
सुलह
डिग्री और करियर का मेल ज़रूरी नहीं #
समझौते का मतलब ये मान लेना नहीं कि डिग्री का कोई मतलब नहीं था। अच्छे काम की चाह जायज़ है। मतलब बस इतना है कि बरसों पहले खींची एक सीधी लकीर अब चले हुए रास्ते पर फ़ैसला नहीं सुनाएगी।
काम की जगह पर इज़्ज़त और सुरक्षा “ज़्यादा उम्मीद” कभी नहीं होती, आपके लिए भी और आपके साथियों के लिए भी। अगर आपको नीचा दिखाया जाए या आगे बढ़ने से रोका जाए, आपके जेंडर, जाति, धर्म, उम्र, किसी विकलांगता या आप कहाँ से आए हैं इस वजह से, तो वो करियर का सवाल नहीं है; उसे गंभीरता से लेना ठीक है।
अगले पारिवारिक खाने की कल्पना कीजिए, उम्मीद को ज़रा ढीला पकड़े हुए: कोई आपके काम के बारे में पूछे, तो आप उसके किस हिस्से की बात करना चुनेंगे?इस पर बात कीजिए ›
एक ज़्यादा सच्चा वाक्य
रविवार के खाने के लिए एक लाइन #
“अच्छी डिग्री से अच्छा करियर बनना चाहिए” के पास कुछ लोग ये लाइन रखते हैं: “मेरी डिग्री ने मुझे गढ़ा है, और मेरे करियर को घूमने की इजाज़त है।” ये पुरानी लाइन से लड़ती नहीं। बस उसके पास बैठती है।
चाचा के जवाब के इंतज़ार में ये शायद बहुत आसान लगे। कुछ लोग अपनी लाइन पसंद करते हैं, शायद थोड़े मज़ाक़ के साथ।
आपकी अपनी कौन-सी लाइन यहाँ बैठेगी, जो पढ़ाई का गर्व भी रखे और चले हुए रास्ते को जगह भी दे?इस पर बात कीजिए ›
क्या रहने दें
करियर वाला सवाल खाने की मेज़ पर रह सकता है #
हर “अभी तक वही नौकरी?” का पूरा जवाब आज रात देना ज़रूरी नहीं। उसे जैसा है वैसा देखकर छोड़ा जा सकता है, जैसे खाने के बाद मेज़ पर तह किया हुआ नैपकिन।
अच्छे करियर की चाह आपकी बनी रह सकती है। किसी वजह से, कि आप कौन हैं, आपको पीछे रखा जाए, ये इस चाह का हिस्सा नहीं है; उसे गंभीरता से लेना ठीक है।
उसे मेज़ पर छोड़ने का मतलब ये नहीं कि सवाल जायज़ था, या कि कुछ सुलझ गया। बस इतना कि घर लौटते हुए बात किसी और चीज़ की हो सकती है।
अगर यह ढीला पड़े
अगर सीधी लकीर थोड़ी धुँधली पड़े #
एक पल के लिए वही दिन सोचिए, पर उम्मीद थोड़ी नीचे रखी हुई। आप काम करते हैं, और देखते हैं कि आपने क्या सीखा: डिग्री से भी, और इस नौकरी से भी।
वो छोटा हो सकता है: कोई काम ऐसे हुनर से निपटा जो आपको पता ही नहीं था कि है, कोई साथी जो आपकी क़द्र करता है, या रविवार का कोई घंटा पुराने विषय को बस शौक़ से पढ़ने में।
इसमें से कुछ भी किसी को बताना ज़रूरी नहीं। आगे के कार्ड इस उम्मीद से समझौते और उसकी बात करते हैं जो पहले से यहाँ मौजूद है।
सबसे पहला छोटा फ़र्क़ क्या है?इस पर बात कीजिए ›
आपका क्या होगा?इस पर बात कीजिए ›
आज़माने की छोटी चीज़ें
आज़माने के लिए कुछ
चुपचाप आज़माने की कुछ छोटी बातें #
- इस हफ़्ते डिग्री की कोई एक स्किल याद कीजिए जो आपने इस्तेमाल की
- अपने मौजूदा काम की एक बात नोटिस कीजिए जो आपको अच्छी लगती है
- करियर वाला सवाल आए, तो उस वक़्त का एहसास एक शब्द में नाम दीजिए
- अपने पुराने विषय पर कुछ पढ़िए, सिर्फ़ मज़े के लिए
- देखिए कि पैमाना किसकी सीधी लकीर का है
मन करे तो एक आज़माइए। हर एक वैकल्पिक है।
एक सवाल चुनिए
बात कीजिए #
किसी एक पर टैप कीजिए। Dr. Thoughts के साथ बातचीत उसी सवाल से खुलेगी: मुफ़्त, निजी, शुरू करने के लिए साइन-अप नहीं।