कहाँ सुनते हैं
रोज़ की ज़िंदगी
रोज़ की ज़िंदगी में सुनी जाने वाली बातें। जो जानी-पहचानी लगे, उसे चुनिए।
- “अपनी बारी का इंतज़ार करो!” इतना क्यों चुभता है?
- “अरे चिल यार, ये सिर्फ़ तुम्हारा फ़्लैट थोड़े ही है” इतना क्यों चुभता है?
- “अरे भाई, रास्ते में क्यों खड़े हो?” इतना क्यों चुभता है?
- “अरे, सबने देख लिया!” इतना क्यों चुभता है?
- “आख़िरी बार कहाँ रखा था?” इतना क्यों चुभता है?
- “आवाज़ नीचे! पड़ोसी सुन लेंगे” इतना क्यों चुभता है?
- “ओए, दिखता नहीं क्या?” इतना क्यों चुभता है?
- “कल आइए, साहब आज नहीं हैं” इतना क्यों चुभता है?
- “कल से पक्का, इस बार सच में!” इतना क्यों चुभता है?
- “कुछ सुनाई भी दे रहा है?” इतना क्यों चुभता है?
- “क्या आप शुरू से पूरी बात बता सकते हैं?” इतना क्यों चुभता है?
- “गाड़ी चलाना सीख ले!” इतना क्यों चुभता है?
- “जल्दी कीजिए, पीछे और लोग हैं!” इतना क्यों चुभता है?
- “जल्दी निकलना चाहिए था ना?” इतना क्यों चुभता है?
- “दिखता नहीं, काम कर रहे हैं?” इतना क्यों चुभता है?
- “पोस्टपोन कर लें?” इतना क्यों चुभता है?
- “बस ग्यारह बजे तक है, थोड़ा एडजस्ट कर लीजिए” इतना क्यों चुभता है?
- “बस पाँच मिनट, पहुँच ही रहे हैं!” इतना क्यों चुभता है?
- “बोर्ड पर लिखा है, पढ़ना नहीं आता क्या?” इतना क्यों चुभता है?
- “माँ-बाप ने कुछ सिखाया नहीं?” इतना क्यों चुभता है?
- “मुझे कुछ काम का करना चाहिए” इतना क्यों चुभता है?
- “ये हमारा काम नहीं है” इतना क्यों चुभता है?
- “सिंक में बर्तन अभी तक पड़े हैं?” इतना क्यों चुभता है?
- “सुबह तक तो बिल्कुल ठीक चल रहा था” इतना क्यों चुभता है?
- “सोमवार से आपकी शिफ़्ट सुबह छह बजे से है” इतना क्यों चुभता है?