कहाँ सुनते हैं
पैसों की बात
पैसों की बात में सुनी जाने वाली बातें। जो जानी-पहचानी लगे, उसे चुनिए।
- “आपके पास तो है ना, फिर क्या सोचना?” इतना क्यों चुभता है?
- “आपको तो कभी पैसों की टेंशन हुई ही नहीं” इतना क्यों चुभता है?
- “इतना पैसा आख़िर जाता कहाँ है?” इतना क्यों चुभता है?
- “इसके इतने पैसे क्यों दिए?” इतना क्यों चुभता है?
- “कितना कमा-वमा लेते हो?” इतना क्यों चुभता है?
- “घर से पैसा आता हो तो क्या कहने” इतना क्यों चुभता है?
- “चलो, बराबर-बराबर कर लेते हैं, ठीक है?” इतना क्यों चुभता है?
- “नई है? कितने की पड़ी?” इतना क्यों चुभता है?
- “पार्टी दो, तनख़्वाह आई है!” इतना क्यों चुभता है?
- “पैसे का दिखावा मत करो” इतना क्यों चुभता है?
- “बिल कभी तुम भी तो भरो!” इतना क्यों चुभता है?
- “भूल गए क्या, मैंने क्या किया था?” इतना क्यों चुभता है?
- “हम कोई नोट छापने की मशीन नहीं हैं” इतना क्यों चुभता है?