लोग जो सुनते हैंघर की बातें14 मिनट में पढ़ें6 कार्ड + गहराई में 15

“और बेटा, आजकल क्या कर रहे हो?” इतना क्यों चुभता है?

छोटा जवाब

ये सवाल इसलिए चुभता है क्योंकि इसे एक साफ़-सुथरी लाइन चाहिए: जॉब टाइटल, कॉलेज का नाम, किसी चीज़ की तारीख़। बदलाव के बीच चल रही ज़िंदगी में अभी ऐसी लाइन होती ही नहीं, बस आधे फ़ैसले, फ़ॉर्म और आज़माए जा रहे आइडिया। मौक़े पर उसे पूरा करने को कहा जाना बेपर्दा-सा कर देता है।

अंदर

अंदर क्या चल रहा है #

तीन बातें जो अक्सर इन शब्दों के नीचे होती हैं।

  • सवाल के साइज़ और ज़िंदगी के साइज़ के बीच का फ़ासला ही अक्सर चुभन की जगह है।

  • बहुत से लोग फ़ैमिली फ़ंक्शन में प्लान की घोषणाएँ सुनते हुए बड़े हुए।

  • नीचे एक चुपचाप नियम बन सकता है: “कहीं जाने से पहले मेरे पास बताने लायक़ जवाब होना चाहिए।”

प्रतिक्रियाएँ

लोग अक्सर क्या करते हैं #

  • चमकाकर दिया गया आधा जवाब, फिर पूरी शाम अजीब-सा लगना
  • “बस, देख रहे हैं” कहना और फ़ौरन रसोई में हाथ बँटाने चले जाना
  • अगला फ़ंक्शन छोड़ देना, या देर से पहुँचकर जल्दी खिसक लेना
  • हर डिटेल ज़रूरत से ज़्यादा समझाना, इस उम्मीद में कि बात हमेशा के लिए बंद हो
  • रात को सवाल दोहराना और बेहतर जवाबों की रिहर्सल करना

डेक

6 कार्ड में पूरी कहानी #

छह छोटे कार्ड, उस पल से छोड़ देने तक।

  1. संगीत की रात, मौसी का सवाल

    जयपुर में कज़िन की शादी, संगीत की रात। दाल-बाटी की प्लेट हाथ में है कि बड़ी मौसी पूरे शामियाने को सुनाते हुए पूछती हैं: “और बेटा, आजकल क्या कर रहे हो? और शादी कब कर रहे हो?” अभी-अभी कज़िन ने बताया है कि बैंगलोर में नौकरी लग गई। आप कहते हैं “बस, कुछ चीज़ें देख रहे हैं,” फिर ज़रूरत से ज़्यादा समझाते हैं, फिर हँस देते हैं। होटल लौटते हुए वो जवाब दोहराते हैं जो काश दिया होता।

  2. बताने लायक़ जवाब होना चाहिए

    पहले साफ़ बात: दो चीज़ों के बीच चल रही ज़िंदगी ग़लत रास्ते पर नहीं, और छोटा जवाब कोई कमी नहीं। पर इस सवाल से एक नियम उग सकता है, जो आपका अपना बन जाता है: “कहीं जाने से पहले मेरे पास बताने लायक़ जवाब होना चाहिए।” ये आगे बढ़ने की चाह जैसा लगता है। पर देखिए ये करता क्या है: हर शादी इम्तिहान बन जाती है, और असली प्लान सुनने वालों की तरफ़ झुकने लगते हैं।

  3. गंभीरता से लिए जाने की चाह

    हम ऐसा नियम इसलिए पकड़ते हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि जो लोग हमें बचपन से जानते हैं, वो हमें गंभीरता से लें। ये बहुत इंसानी और बहुत आम चाह है। शायद आपने “शर्मा जी का बेटा” वाली ख़बरें गर्व से दोहराई जाती सुनीं। शायद आपको फ़िक्र है कि किसी को चिंता न हो। अपनी ज़िंदगी उन्हें समझ आए, ये चाहना दिखावा नहीं। इसे दोष नहीं, नरमी चाहिए।

  4. जीने की जगह रिहर्सल

    हर सवाल बोझ थोड़ा बढ़ाता है। धीरे-धीरे होता है, इसलिए पता भी नहीं चलता। त्योहारों पर घर जाने से कतराने लगते हैं। फ़ैमिली कॉल छोटी होती जाती हैं। अच्छी ख़बर तब तक रोकते हैं जब तक वो काफ़ी बड़ी न लगे। चीज़ें कुछ इस हिसाब से चुनते हैं कि शादी में कैसी सुनाई देंगी। ज़िंदगी का ईमानदार बीच छिपाने की चीज़ लगने लगता है, और बहुत ताक़त जीने के बजाय रिहर्सल में जाती है।

  5. क्या परफ़ेक्ट जवाब इस लायक़ है?

    ईमानदारी से ख़ुद से पूछिए: क्या इस नियम को पकड़ने से कभी वो सवाल सुनना आसान हुआ? या ज़्यादातर इसने आपको रिहर्सल में लगाए रखा, और एक आम-से बीच के दौर पर थोड़ा शर्मिंदा? उस मेज़ पर लगभग हर किसी की कहानी का बीच कभी अधूरा था। यहाँ कोई ग़लत जवाब नहीं। क्या इस नियम को इतना कसकर पकड़ना उस क़ीमत के लायक़ है जो ये माँगता है?

  6. बीच भी गिना जाता है

    छोड़ने का मतलब ये नहीं कि उनका सवाल हमेशा प्यार भरा था, या चुभा नहीं। मतलब ये कि कमरे में जाने के लिए अब किसी हेडलाइन की ज़रूरत नहीं। आप कह सकते हैं “अभी तय कर रहे हैं, मज़ेदार दौर है,” रायता आगे बढ़ा सकते हैं, और बाक़ी कहानी तब के लिए रख सकते हैं जब वो तैयार हो। शुरुआत छोटी हो सकती है, एक शादी, एक बार। वहीं से कुछ चैन लौटता है: बीच भी गिना जाता है।

    If questions about your plans ever come with threats, being frightened, or your money, phone or papers being held, that is not everyday family talk and is worth taking seriously.

पलट

पुराना नियम, और आज़माने के लिए एक नया #

पुराना नियमकहीं जाने से पहले मेरे पास बताने लायक़ जवाब चाहिए।

आज़माने के लिए नया नियममैं किसी चीज़ के बीच में हूँ, और बीच भी गिना जाता है।

अगली बार के लिए

अगली बार आज़माइए #

  1. कदम 1

    जेब में रखने के लिए एक छोटी, सच्ची लाइन चुनिए

  2. कदम 2

    ख़ुद से उस एक चीज़ का नाम लीजिए जो इस महीने आगे बढ़ी

  3. कदम 3

    जब रिहर्सल शुरू हो, मन में कहिए “लो, फिर वही सवाल”

इस पर बात करनी है?

“आपके प्लान के बारे में किसका सवाल सबसे भारी लगता है, और उन्हीं का क्यों?”

मुफ़्त और निजी। शुरू करने के लिए साइन-अप नहीं। बातचीत इसी सवाल से खुलती है।

Dr. Thoughts के साथ बात कीजिए

यह डेक जो कुछ जानता है

और गहराई में #

यह कैसा सुनाई देता है, कहाँ से आता है, इसकी क्या कीमत है, और इसे देखने के दूसरे तरीके। हर सवाल पर बातचीत खुलती है।

यह कैसे लगता है

क्या कहा गया

एक आसान-सा सवाल, जिसमें बहुत कुछ भरा है #

जयपुर की शादी में कोई मौसी, इतवार की वीडियो कॉल पर मामाजी, एयरपोर्ट पर लेने आए पापा के दोस्त। “और बेटा, आजकल क्या कर रहे हो?” सवाल समोसे और अगली फ़ोटो के बीच आता है, और आसपास के सब लोग ज़रा-सा आगे झुककर इंतज़ार करने लगते हैं।

काग़ज़ पर ये प्यार भरा सवाल है। पर जब ज़िंदगी दो चीज़ों के बीच हो, एग्ज़ाम के बाद, नौकरी छूटने पर, कोर्स बदलने पर या कोई प्लान जो अभी बन ही रहा है, तो ये सवाल कम और किसी पैनल के सामने रिपोर्ट पेश करने जैसा ज़्यादा लगता है।

आख़िरी बार ये किसने पूछा?इस पर बात कीजिए ›

आप कहाँ खड़े थे, और कौन-कौन सुन रहा था?इस पर बात कीजिए ›

ठीक से तय करने से पहले ही मुँह से क्या निकल गया?इस पर बात कीजिए ›

पहले कुछ पल

दिमाग़ एकदम ख़ाली क्यों हो जाता है #

कई लोगों को सीने में हल्की जकड़न लगती है और सही-सा जवाब ढूँढने की हड़बड़ी। गाड़ी में जो लाइनें तैयार थीं, वो अचानक ग़ायब, और जो निकलता है वो छोटा, गोल-मोल या ज़रूरत से ज़्यादा चहकता हुआ: “बस, देख रहे हैं।” इसमें ज़रूरत से ज़्यादा नाज़ुक होने जैसा कुछ नहीं।

बचपन से जानने वालों के सामने ये पूछा जाना कि आप कहाँ खड़े हैं, शरीर को एक बड़ा पल लगता है। इसलिए रिएक्शन सोचने से पहले, फ़ौरन आता है, और सोचा-समझा जवाब अक्सर एक घंटे बाद, घर लौटती गाड़ी में सूझता है।

जब सवाल आया, आपके शरीर ने क्या किया?इस पर बात कीजिए ›

आवाज़ में चहक भर ली, प्लेट की तरफ़ देखा, या फटाफट सफ़ाई देने लगे?इस पर बात कीजिए ›

वो पहला खिंचाव उस कमरे में किसकी मंज़ूरी के बारे में क्या कहता है?इस पर बात कीजिए ›

यह क्यों लगता है

ज़िंदगी ड्राफ़्ट में है, सवाल हेडलाइन माँगता है #

ये सवाल इसलिए चुभता है क्योंकि इसे एक साफ़-सुथरी लाइन चाहिए: जॉब टाइटल, कॉलेज का नाम, किसी चीज़ की तारीख़। बदलाव के बीच चल रही ज़िंदगी में अभी ऐसी लाइन होती ही नहीं, बस आधे फ़ैसले, फ़ॉर्म और आज़माए जा रहे आइडिया। मौक़े पर उसे पूरा करने को कहा जाना बेपर्दा-सा कर देता है।

सवाल के साइज़ और ज़िंदगी के साइज़ के बीच का फ़ासला ही अक्सर चुभन की जगह है। रिश्तेदार पाँच शब्दों में पूछते हैं, और सच्चा जवाब बीस मिनट, कुछ शक और एक ऐसा प्लान माँगता है जो हर हफ़्ते बदल रहा है।

सबसे ज़्यादा क्या चुभा: सवाल, सुनने वाले लोग, या वो जवाब जो आपको लगा कि अब तक होना चाहिए था?इस पर बात कीजिए ›

और अगर किसी क़रीबी दोस्त ने अकेले में, चाय पर पूछा होता, तो क्या वैसा ही लगता?इस पर बात कीजिए ›

अंदर की आवाज़

वो जवाब जिसकी मन रिहर्सल करता रहता है #

शादी ख़त्म हो जाती है, पर सवाल अपने आप चलता रहता है। “अगली बार क्या बोलूँ?” “सबके पास बताने को कुछ है।” “अब तक तो सेटल हो जाना चाहिए था।” “फिर से गुड्डू से कम्पेयर करेंगे।”

कुछ लोग किसी भी फ़ंक्शन से पहले रिहर्सल शुरू कर देते हैं: नहाते हुए, शादी के रास्ते में, यहाँ तक कि कपड़े चुनते हुए। रिश्तेदार ने एक बार पूछा, पर अंदर की आवाज़ हफ़्ते में बीस बार पूछ सकती है, हर बार पिछली से थोड़ा तीखा।

रिहर्सल किसकी आवाज़ में होती है?इस पर बात कीजिए ›

मौसी की, मम्मी-पापा की, या आपकी अपनी?इस पर बात कीजिए ›

और क्या वो कभी पूछती है कि आप असल में क्या चाहते हैं, या बस ये कि किसी के पूछने पर क्या अच्छा लगेगा?इस पर बात कीजिए ›

यह कहाँ से आता है

यह कहाँ से आ सकता है

प्लान का ये स्कोरबोर्ड कहाँ से आता है #

बहुत से लोग फ़ैमिली फ़ंक्शन में प्लान की घोषणाएँ सुनते हुए बड़े हुए। कौन नौकरी बदल रहा है, किसका किस कॉलेज में हुआ, कौन कनाडा जा रहा है, किसकी शादी अगली सर्दियों में है। जवाब तैयार रखना बातचीत का हिस्सा था, और रुकना जैसे आपके नंबर कट जाना।

बहुत से परिवारों में बड़ी ख़बरें घर-घर घूमती थीं, “शर्मा जी का बेटा तो कनाडा चला गया,” और इसकी वजहें हर घर में अलग हैं। इसके बीच बड़े होते हुए जल्दी सीख लिया जाता है कि ज़िंदगी हमेशा एक ऐसी लाइन में समझाई जा सके जो दोहराने में अच्छी लगे।

आपने पहली बार कब ग़ौर किया कि कुछ जवाबों पर बड़े मुस्कुराते थे और कुछ पर कमरा चुप हो जाता था?इस पर बात कीजिए ›

किसकी ख़बर सबसे ज़्यादा दोहराई जाती थी, और आपने अपनी के बारे में क्या तय किया?इस पर बात कीजिए ›

इसके नीचे की मान्यता

नीचे बैठा एक चुपचाप नियम #

नीचे एक चुपचाप नियम बन सकता है: “कहीं जाने से पहले मेरे पास बताने लायक़ जवाब होना चाहिए।” कुछ इसे ऐसे ढोते हैं: “सब आगे निकल गए, मैं वहीं का वहीं,” या “मेरी ज़िंदगी तभी गिनी जाएगी जब एक लाइन में समझ आ जाए।”

ऐसे नियम मान्यता नहीं, सच्चाई लगते हैं, क्योंकि ये बहुत पहले सीखे गए और बहुत बार दोहराए गए। इसीलिए इन्हें कभी-कभी, नरमी से और थोड़ी दूरी से देखना ठीक है, जैसे कोई पुरानी फ़ोटो देखते हैं।

कुछ लोग ऐसे नियम को बचपन से जोड़ते हैं, कुछ नहीं। दोनों तरह से इसे देखा जा सकता है: ठहराव नाकामी जैसा दिखता है, तो हमेशा कुछ बताने को रखो।

ये किन कमरों में अब भी फ़िट बैठता है, और किनमें नहीं?इस पर बात कीजिए ›

इसकी क्या कीमत है

इसकी क्या कीमत है

ये सवाल चुपचाप क्या ले जाता है #

इसका मतलब हो सकता है शादियों और त्योहारों पर घर जाने से कतराना, फ़ैमिली कॉल छोटी रखना, या अगला क़दम कुछ इसलिए चुनना कि पूछे जाने पर अच्छा लगेगा। कुछ लोग असली ख़बर तब तक रोकते हैं जब तक वो बताने लायक़ बड़ी न हो, और छोटे, सच्चे हिस्से कोई सुन ही नहीं पाता।

ये बीच के एक ईमानदार दौर को भी छिपाने लायक़ चीज़ बना सकता है, जबकि बीच के दौर लगभग हर ज़िंदगी में आते हैं। प्लान जीने वाले के लिए नहीं, सुनने वालों के लिए बनने लगते हैं, और ख़ुद प्लान को बढ़ने की जगह कम मिलती है।

ये कमज़ोरी की वजह से नहीं। बार-बार ख़ुद को समझाना किसी को भी निचोड़ देता है।

इस साल इसकी क़ीमत क्या रही: कोई फ़ंक्शन जो छोड़ा, कोई प्लान जिसमें जल्दबाज़ी की, कोई अच्छी ख़बर जो अपने पास रखी?इस पर बात कीजिए ›

अगर यह ऐसा ही रहे

पाँच साल और, जवाब की रिहर्सल करते हुए #

किसी आम त्योहार की शाम की तस्वीर बनाइए, उस दिन की जब “मुझे बताने लायक़ जवाब चाहिए” अंदर ज़ोर से बोल रहा हो। ये बस देखने की तस्वीर है, ठीक करने को कुछ नहीं।

शायद कोई फ़ैसला जो इसलिए लिया कि शादी में अच्छा सुनाई देगा, चार मिनट में निपटाई गई फ़ैमिली कॉल, सिरदर्द के बहाने छोड़ा गया कोई फ़ंक्शन, जबकि सिरदर्द पूरा सच नहीं था। शायद कोई छोटी, सच्ची अच्छी ख़बर जो अब भी बताए जाने का इंतज़ार कर रही है।

यहाँ किसी चीज़ का अभी जवाब नहीं चाहिए, और तस्वीर जब चाहें नीचे रख सकते हैं।

उसमें क्या है: वहाँ तक का रास्ता, कमरे के कोने, जेब में तैयार जवाब?इस पर बात कीजिए ›

उसे देखते हुए, अगर कुछ, तो आपको क्या दिखता है?इस पर बात कीजिए ›

इसे देखने का दूसरा तरीका

इसे देखने का दूसरा तरीका

ज़्यादातर ज़िंदगियाँ एक लाइन में नहीं समातीं #

लगभग हर किसी का एक दौर रहा है जब सच्चा जवाब था “अभी समझ रहे हैं।” तीस की उम्र में करियर बदलना, एग्ज़ाम का दूसरा अटेम्प्ट, मुश्किल साल के बाद गैप ईयर, दुबई जाना जो प्लान के मुताबिक़ नहीं चला। पूछने वाले कई मौसा-मौसियों का भी ऐसा दौर रहा होगा।

ऐसे दौर फ़ैमिली फ़ंक्शन में कम ही आते हैं, क्योंकि लोग बाद में बस साफ़-सुथरा हिस्सा बताते हैं। तो सवाल पूरी हो चुकी कहानियों से भरे कमरे में आता है, जबकि उनमें से ज़्यादातर कहानियों के अधूरे बीच की उस वक़्त किसी ने घोषणा नहीं की थी।

एक और नज़र: कुछ रिश्तेदारों के लिए ये सवाल आपकी ज़िंदगी में झाँकने का अकेला दरवाज़ा है जो उन्हें आता है।

अगर आप इसे इम्तिहान नहीं, अटपटी दिलचस्पी की तरह सुनें, तो जो जवाब देना ज़रूरी लगता था, उसमें क्या बदलेगा?इस पर बात कीजिए ›

इसे जल्दी पहचानना

ग़ौर से देखने पर लोगों को क्या दिखता है #

जब लोग उस पल को धीरे-धीरे दोहराते हैं, तो कुछ को दिखता है कि ज़्यादातर बोझ सवाल से नहीं आया था, जो बस कुछ शब्दों का था, बल्कि उनकी अपनी “अभी तक नहीं हुआ” वाली लिस्ट से, जो पीछे ज़ोर-ज़ोर से बज रही थी।

कुछ को दिखता है कि उनके असली जवाब में उससे ज़्यादा है जितना उन्होंने माना: कुछ जो सीखा जा रहा है, कोई फ़ैसला जो सँभलकर तौला जा रहा है, कोई चुपचाप मेहनत जिसके बारे में मेज़ पर किसी को पता नहीं। बस उसके साथ अभी कोई जॉब टाइटल नहीं।

अगर आप लिखें कि पिछले महीनों में असल में क्या करते रहे, सीधे शब्दों में, बिना सजाए, तो उसमें क्या होगा?इस पर बात कीजिए ›

उनमें से कौन-सी बात आपने कभी ज़ोर से नहीं कही?इस पर बात कीजिए ›

इससे सुलह

परफ़ेक्ट जवाब की ज़रूरत नहीं #

सुलह का मतलब ये नहीं कि हर शादी में हर मौसी के लिए एक प्लान तैयार हो। मतलब बस इतना कि उस सवाल का इस पर थोड़ा कम चले कि शाम कैसी जाएगी, और कौन-से फ़ैसले सिर्फ़ इसलिए लिए जाएँगे कि बताने को कुछ हो।

कुछ लोगों को हल्का लगता है जब वो सवाल को इम्तिहान की तरह सुनना छोड़ देते हैं। एक छोटा, सच्चा जवाब, जैसे “कुछ चीज़ों पर काम चल रहा है, अभी तय कर रहे हैं”, काफ़ी हो सकता है, और बाक़ी कहानी उनकी अपनी रहती है, जब तैयार हो तब बताने को।

कैसा लगेगा अगर अगले फ़ंक्शन में बिना तैयार भाषण के जाएँ, बस एक छोटी, सच्ची लाइन लेकर, और बाक़ी शाम खाने और लोगों के नाम कर दें?इस पर बात कीजिए ›

एक ज़्यादा सच्चा वाक्य

बीच के दौर के लिए एक सच्ची लाइन #

अगर हर बार किसी के पूछने पर “सब आगे निकल गए” बजता है, तो उससे बहस करने की ज़रूरत नहीं। कुछ लोग इसके बजाय एक सच्चा वाक्य तैयार रखते हैं: “मैं किसी चीज़ के बीच में हूँ, और बीच भी गिना जाता है।”

शुरू में ये फीका लग सकता है, ख़ासकर घोषणाओं से भरे कमरे में। कुछ लोगों को लगता है कि धीरे से और बार-बार कहने पर ये पुरानी लाइन की थोड़ी जगह ले लेता है, और अगला सवाल थोड़ा आसान लगता है।

आपके अपने शब्दों में सच्चा वाक्य क्या होगा, जो अभी न जानने के बारे में ईमानदार हो, बिना उस न जानने को माफ़ी माँगने की चीज़ बनाए?इस पर बात कीजिए ›

क्या रहने दें

कुछ सवालों का जवाब देकर उन्हें नीचे रखा जा सकता है #

हर सवाल को पूरा हिसाब नहीं चाहिए, न ऐसा प्लान जो बस उसे शांत करने को बने। कुछ का छोटा-सा जवाब दिया जा सकता है, एक पल महसूस किया जा सकता है, और रसोई की तरफ़ जाते हुए ख़ाली चाय के कप के साथ नीचे रखा जा सकता है।

ये कुछ छिपाना नहीं है। ये चुनना है कि आपकी ताक़त कहाँ लगे, और कुछ लोग कहते हैं इससे ख़ुद प्लान के लिए ज़्यादा जगह बचती है, न कि इस रिहर्सल के लिए कि वो रिश्तेदारों से भरे कमरे में कैसे सुनाई देंगे।

शाम भर के लिए सवाल को नीचे रखने का मतलब ये नहीं कि प्लान मायने नहीं रखते। बस इतना कि रिहर्सल को आपके साथ गाड़ी में घर तक आने की ज़रूरत नहीं।

अगर यह ढीला पड़े

और अगर नियम थोड़ा भी ढीला हो #

सिर्फ़ एक तस्वीर की तरह सोचिए कि नियम एक दर्जा धीमा हो गया है। सवाल अब भी आता है, पर बस एक सवाल है, रिपोर्ट कार्ड नहीं।

छोटी चीज़ें काफ़ी हो सकती हैं: मौसी को एक आसान लाइन में दिया गया जवाब, बिना रिहर्सल के ली गई दूसरी प्लेट, कोई प्लान जो इसलिए चुना कि वो आपको जँचता है, इसलिए नहीं कि अच्छा सुनाई देगा।

यहाँ किसी से कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। जो भी आए, वो आपका है, और ग़ौर करने लायक़ है। अगर इसे ठीक से देखना चाहें, तो बातचीत बस एक टैप दूर है।

अंदर जाते हुए सबसे पहले क्या अलग लगता है?इस पर बात कीजिए ›

आपकी पहली छोटी चीज़ क्या होगी?इस पर बात कीजिए ›

आज़माने की छोटी चीज़ें

आज़माने के लिए कुछ

कुछ छोटी चीज़ें जो लोग आज़माते हैं #

  • मन में एक छोटा, सच्चा जवाब तैयार रखिए: “कुछ चीज़ों पर काम चल रहा है, अभी तय कर रहे हैं”
  • जब सवाल आए, जवाब से पहले एक बार साँस छोड़िए, और एक लाइन को काफ़ी रहने दीजिए
  • बाद में ख़ुद से उस एक चीज़ का नाम लीजिए जो इस महीने आगे बढ़ी, चाहे कितनी भी छोटी
  • जब मन रिहर्सल शुरू करे, ग़ौर कीजिए, और चुपचाप कहिए “लो, फिर वही सवाल”

छोटे, निजी और सब अपनी मर्ज़ी से। जो आसान लगे, वो आज़माइए।

एक सवाल चुनिए

बात कीजिए #

किसी एक पर टैप कीजिए। Dr. Thoughts के साथ बातचीत उसी सवाल से खुलेगी: मुफ़्त, निजी, शुरू करने के लिए साइन-अप नहीं।