कहाँ सुनते हैं
घर की बातें
घर की बातें में सुनी जाने वाली बातें। जो जानी-पहचानी लगे, उसे चुनिए।
- “अब घर पर हो, तो खाना नौ बजे ही होगा” इतना क्यों चुभता है?
- “अरे छोड़ो, हो जाएगा!” इतना क्यों चुभता है?
- “अरे, कहाँ ग़ायब हो?” इतना क्यों चुभता है?
- “अरे, तुम्हें किसी ने बताया नहीं?” इतना क्यों चुभता है?
- “इस बार तो सब हमारे यहाँ आ रहे हैं!” इतना क्यों चुभता है?
- “और बेटा, आजकल क्या कर रहे हो?” इतना क्यों चुभता है?
- “कितने दिन रुकना है इस बार?” इतना क्यों चुभता है?
- “कितने परसेंट आए?” इतना क्यों चुभता है?
- “केक के टाइम तुम्हें वीडियो कॉल पर ले लेंगे!” इतना क्यों चुभता है?
- “खाना खाया? पहुँचकर मैसेज कर देना” इतना क्यों चुभता है?
- “चाय कहाँ है?” इतना क्यों चुभता है?
- “टैलेंट बर्बाद कर रहे हो” इतना क्यों चुभता है?
- “तुमने तो हमारी नाक कटवा दी” इतना क्यों चुभता है?
- “तुम्हारी मम्मी ने तो सब बता दिया, बेटा” इतना क्यों चुभता है?
- “तुम्हारे तो रंग-ढंग ही बदल गए” इतना क्यों चुभता है?
- “तुम्हीं कर लो, तुम्हें बढ़िया आता है” इतना क्यों चुभता है?
- “तुम्हें किसी चीज़ की क़द्र ही नहीं” इतना क्यों चुभता है?
- “तुम्हें तो बस अपनी पड़ी रहती है” इतना क्यों चुभता है?
- “तुम्हें नहीं समझ आएगा” इतना क्यों चुभता है?
- “तू किसकी तरफ़ है?” इतना क्यों चुभता है?
- “तू पास में है ना, तू देख ले” इतना क्यों चुभता है?
- “बिल्कुल अपने बाप पर गए हो” इतना क्यों चुभता है?
- “बेटा, तू बात कर ले उससे, तेरी तो वो सुनता है” इतना क्यों चुभता है?
- “बेटा, फ़ैमिली ग्रुप में जवाब क्यों नहीं दिया?” इतना क्यों चुभता है?
- “बेटा, रात हो गई” इतना क्यों चुभता है?
- “मुझे तुम पर भरोसा था” इतना क्यों चुभता है?
- “लोग क्या कहेंगे?” इतना क्यों चुभता है?
- “शादी में आ रहे हो ना?” इतना क्यों चुभता है?
- “हमने तुम्हारे लिए क्या-क्या नहीं किया” इतना क्यों चुभता है?
- “हमें तुमसे ये उम्मीद नहीं थी” इतना क्यों चुभता है?