कहाँ सुनते हैं
अपनी क़द्र
अपनी क़द्र में सुनी जाने वाली बातें। जो जानी-पहचानी लगे, उसे चुनिए।
- “इतने में ही ख़ुश?” इतना क्यों चुभता है?
- “किसी भी पल पोल खुल जाएगी, सब जुगाड़ है” इतना क्यों चुभता है?
- “तारीफ़ भी सीधे नहीं ले सकते क्या?” इतना क्यों चुभता है?
- “तुम तो बस एवरेज हो, कुछ ख़ास नहीं” इतना क्यों चुभता है?
- “तुम्हारा तो बस तुक्का लग गया” इतना क्यों चुभता है?
- “थोड़ा नॉर्मल रहो ना, सबकी तरह” इतना क्यों चुभता है?
- “बस इतना ही किया?” इतना क्यों चुभता है?
- “बोलने की ज़रूरत ही क्या थी?” इतना क्यों चुभता है?
- “सब कर लेते हैं, एक तुमसे ही नहीं होता?” इतना क्यों चुभता है?
- “सॉरी, ज़रा डिस्टर्ब किया, पर…” इतना क्यों चुभता है?